Ganesh Chaturthi Katha 10 दिनों का गणेश चतुर्थी पर्व क् यों मनाते हैं

गणेश चतुर्थी क्‍यों मनाते हैं, जानिए क्या है पौराणिक कथा

गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) का त्यौहार सनातन हिन्दू धर्म में बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है पर क्या आपको पता है गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है आइये जानते है क्या है इसके पीछे की पौराणिक कथा- 

गणेश को 108 विभिन्न नामों (108 Names of Lord Ganesha) से जाना जाता है और वह कला और विज्ञान के भगवान है, साथ ही ज्ञान के देवता भी है। उन्हें अनुष्ठानों और अगमनों की शुरुआत में सम्मानित किया जाता है क्योंकि वह नए आरंभों के भगवान के रूप में माने जाते हैं। वह आमतौर पर गणपति या विनायक के रूप में प्रिय और व्यापक रूप से संदर्भित होते हैं।

10 दिन के गणेशोत्सव देश भर में भाद्रपद मास के शुक्‍ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। मान्‍यता है कि इस दिन भगवान गणेशजी का जन्‍म हुआ था, इस उपलक्ष्‍य में पूरे देश में धूमधाम से गणेश चतुर्थी का उत्‍सव मनाया जाता है। 

गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा | Ganesh Chaturthi Poranik Katha

गणेश चतर्थी के विषय में कई पौराणिक कथाये प्रचलित यहाँ हम कुछ कथाये पेश कर रहे है –

कथा-1 

मान्यताओं के अनुसार महाभारत की रचना महृषि वेदव्यास द्वारा पौराणिक काल में हुई थी कहा जाता है वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना के लिए गणेश जी का आह्वान किया था और इसे लिपिबद्ध करने की प्राथना की थी। 

भगवान गणेश ने महृषि की प्राथना स्वीकार कर ली पर एक शर्त राखी कि  “मैं जब लिखना प्राम्भ करूँगा तो कलम को नहीं रोकूंगा और यदि ऐसा हुआ की मेरी कलम रुक गयी तो मैं लिखना बंद कर दूंगा”. 

महृषि वेदव्यास ने कहा की प्रभु में साधारण ऋषि हु यदि मुझसे श्लोक में कोई त्रुटि हो सकती है , अतः आप बिना समझे और त्रुटि हो तो निवारण करके ही श्लोक को लिपिबद्ध करना। 

माना जाता है कि गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) के दिन से व्यास जी ने  महाभारत के श्लोक बोलना आरम्भ किया और गणेश जी ने इसे लिपिबद्ध करना प्रारम्भ किया और ये कार्य पुरे 10 दिनों तक चला तथा अनंत चतुर्थी के दिन लेखन कार्य समाप्त हुआ। 

लगातार १० दिनों तक गणेश जी ने एक आसान पर विराजमान होकर महाभारत को लिपिबद्ध करते रहने से उनका शरीर सुख जाने और उनके शरीर पर धूल और मिट्टी की परत जम गई. 10 दिनों के बाद गणेश जी ने सरस्वती नदी में स्नान किया और अपने शरीर को साफ किया।

उन्होंने लिखने का कार्य भाद्रमास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को शुरू किया था। इस आदर्श के साथ, हर साल इसी तिथि को गणेशजी की प्रतिमा को स्थापित करके के पूजा की जाती है और दस दिन तक उनकी पूजा करके, मन, वचन, कर्म, और भक्ति से उनकी उपासना करके, अनंत चतुर्दशी को विसर्जित किया जाता है। 

इसका आध्यात्मिक महत्व है कि हम दस दिनों तक संयम बनाए रखें और फिर दस दिनों के बाद अपने मन और आत्मा पर जमी हुई वासनाओं की धूल और मिट्टी को प्रतिमा के साथ ही विसर्जित करके, एक शुद्ध और परिष्कृत मन और आत्मा को प्राप्त करें।

Why we celebrate ganesh chaturthi 1

कथा-2 

एक अन्य बहु प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार, भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। इस समय माता पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय बिताने के लिए चौपड़ खेलने का प्रस्ताव दिया। माता पार्वती की प्रार्थना पर, भगवान शिव चौपड़ खेलने के लिए तैयार हो गए, लेकिन खेल की जीत और हार का फैसला कौन करेगा, यह प्रश्न माता पार्वती के सामने आया।

इस समय, भगवान शिव ने कुछ तिनके एकत्र करके उनके सामने एक पुतला बनाया और उस पुतले में प्राण-प्रतिष्ठा करके कहा कि वे चौपड़ खेलना चाहते हैं, परंतु उनमें से कोई भी हार और जीत का फैसला नहीं करेगा। इसलिए, आपको बताना होगा कि कौन जीता और कौन हारा। इसके बाद, खेल शुरू हो गया और यह चौपड़ खेल में माता पार्वती ने तीन बार जीत गईं ।

खेल के समापन के बाद, भगवान शिव ने पुतले से हार और जीत का फैसला करने के लिए कहा। पुतले ने बताया कि भगवान शिव जी विजयी हैं।

माता पार्वती ने इस बात पर अपने क्रोध में उभर कर बालक को श्राप दिया कि वह लंगड़ा हो जाए और कीचड़ में गिर जाए। बालक, जो पुतला था, डरकर माफी मांगा और कहा कि उसने जानबूझकर ऐसा किया नहीं था, और उसने माता पार्वती से क्षमा मांगी। माता पार्वती को बालक के क्षमा मांगने पर दया आई और उन्होंने उसे इस श्राप से मुक्त करने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि वहां गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी, और उनके निर्देशों के अनुसार बालक को भी गणेश पूजन करना चाहिए। इसके बाद, माता पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं।

एक वर्ष बाद, उसी स्थान पर नाग कन्याएं आईं, और उनसे बालक ने विघ्नहर्ता भगवान गणेश के व्रत और पूजन की विधि पूछी। इसके बाद, बालक ने 21 दिन तक गणेश जी का व्रत और पूजन (Ganesh Vrat Puja) किया। उसकी भक्ति और पूजन से भगवान गणेश प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिलाएं और मनोकामनाएं पूरी करने का आशीर्वाद दिया। बालक ने इस पर भगवान से यह विनती की कि उन्हें इतनी शक्ति दें कि वह अपने पैरों से कैलाश पर्वत पर जाकर अपने माता-पिता के साथ मिल सकें। इसके परम्परागत पूजा के बाद, बालक ने अपनी कथा भगवान शिव को सुनाई।

इसके बाद, भगवान शिव ने भी विघ्नहर्ता भगवान गणेश के व्रत का पालन किया, और इस व्रत की विधि माता पार्वती को बताई। इससे माता पार्वती के मन में उनके पुत्र कार्तिकेय से मिलने की आकांक्षा जागी, और उन्होंने विघ्नहर्ता भगवान गणेश के व्रत का पालन किया। व्रत के 21 दिनों के उपासना और पूजन के बाद, माता पार्वती ने खुद ही अपने पुत्र से मिलन किया।

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